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िकताबें

March 25, 2012

Books – A Hindi Poem

िकताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से,
बड़ी हसरत से तकती हैं,
महीनों तक मुलाक़ातें नहीं होती.
जो शामें इनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती हैं कम्प्यूटर के परदों पर.
बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें
उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है….
बड़ी हसरत से तकती हैं
जो कदरें वो सुनाती थी
कि जिनके सैल कभी मरते नहीं थे.
वो कदरें अब नज़र आती नहीं घर में
जो रिश्ते वो सुनाती थी
वो सारे उधड़े-उधड़े हैं
कोई सफ़हा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है,
कई लफ़ज़ों के मानी गिर पड़े हैं,
बिना पत्‍तों के सूखे तुंद लगते हैं वो सब अल्फ़ाज़..
कि जिनमे अब कोई मानी नहीं उगते
बहुत सी इस्सिलाहें हैं…
जो मिट्‍टी के सकूरों की तरह बिखरी पड़ी हैं..
गिलासों ने उन्हें मदरूफ़ कर डाला
ज़ुबान पर ज़ायका आता था जो सफ़हे पलटने का
अब उँगली ‘क्लिक’ करने से बस इक
झपकी गुज़रती है
बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर
किताबों से जो जाती राब्ता था, कट गया है
कभी सीने पे रख के लेट जाते थे
कभी गोदी में लेते थे
कभी घुटनों को अपने रेहल की सूरत बनाकर
नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से
ये सारा इल्म तो मिलता रहेगा बाद में भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल
महके हुए रुक्के
किताबें माँगने, गिरने, उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे
उनका क्या होगा
वो शायद अब नही होंगे !!

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